
हमारी बहस चल रही थी की मनोज ने मुझसे पूछा की, बताओ की हम ईमानदार और बईमान कोई कैसे पहचाने?
मैंने उसको कहा की, इस धरती पर अगर कोई सबसे बड़ा ईमानदार हुआ है, तो हैं राजा हरीशचंद्र। उनसे बड़ा इंमानदर अब तक कोई नहीं हुआ है। मनोज बोला, कैसे? थोड़ा समझाओ मुझे?
मैंने उसको समझाते हुए कहा की, "राजा हरीशचंद्र ने जो वचन सपने में दिया था उसको हक़ीक़त में पूरा किया। जिसके चलते उनको अपना सब कुछ दान देना पड़ा। क्योंकि उन्होने सपने में अपना सब कुछ दान देने का वचन किया था।"
तुम आज के लोगों को लेलो, वचन तो दूर की बात है, एक घंटे पहले कही बात से मुकर जाते हैं और सफाई देते हुए लोग कह भी देते है की, "मैंने तो ये कहा ही नहीं।" मामला अगर बढ़ जाए तो लोग ये भी कह देते हैं की, "मैं तो तुमको जनता ही नहीं हूँ।"
ईमानदारी की शुरुवात व्यक्ति के अंदर से होती है। आज के वक़्त में कोई भी ईमानदार नहीं है। क्योकि लोग खुद को ही धोखे में रखते हैं। मैं स्वयं भी ईमानदार नहीं हूँ। क्योकि मैं खुद से जो वादा करता हूँ कई बार वो निभा नहीं पता हूँ। इसका मुझे दुःख होता है। अगले दिन मैं फिर से कुछ वादे खुद से करता हूँ। वो अगले दिन फिर से टूट जाते हैं।
सबसे पहले व्यक्ति को खुद ईमानदार होना पड़ेगा। तभी वो दूसरों को ईमानदारी का पाठ पढ़ा सकता है। मैं कोशिश कर रहा हूँ तुम भी करो।
जब हम अपने कर्त्तव्य के लिए इतने मजबूत हो जाए की खुद से किया वादा समय पर पूरा कर सकेगी। तब जाकर हम ईमानदार होंगे। वो ईमानदारी की चरम सीमा होगी।
अशोक कुमार
आगे पढ़े:- ईमानदार और बईमान को कैसे पहचाने? सब एक जैसे ही नज़र आते हैं।
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